Posts

स्वागत वन्दना (हिंदी कुंडलिया छंद)

स्वागत वंदन आपका , करते है करजोर । चले कलम अब आपकी , साँझ सबेरे भोर ।। साँझ सबेरे भोर , लेखनी धार बहाये । लिखे जगत की पीर , सभी के मन को भाये ।। होना ना कमजोर , रोज सुख दुख है भागत । रहो...

माँ शारदे वंदना (कुंडलिया छंद)

वंदन माता शारदे , करव सुमरनी तोर । दे हमला वरदान माँ , अरजी हावय मोर ।। अरजी हावय मोर , छंद ला हम सब गावन । आके देबे ज्ञान , तोर माँ लइका हावन । तोर चरन के धूल , हमर माथा के चंदन । करत ह...

बेटी के सुरक्छा (घनाक्षरी छंद)

बेटी ला जी मान मिले , चेहरा उखर खिले । आवव सबो मिलके , बेटी ला बचाव जी । बेटी बिन जग सुन्ना , गोठ सबो होंगे जुन्ना । बेटी ला बचाके अब , नवा जुग लाव जी । बेटी लछमी कहाँथे , तभे जी ओ मान पा...

किसान के पीरा (घनाक्षरी छंद )

बदली हा छावत हे , पानी नइ आवत हे । देखत किसान मन , बड़ पछताय जी । करत सबो बियासी , थोड़ा रोय थोड़ा हासी । जोहत हे रद्धा रोज , थक हार आय जी ।। काही नइ भावत हे , सनसो हा खावत हे । करे का बिधाता ...

गुरु वंदना कुंडलिया छंद

वंदन गुरू चरन करव , लगा चरन मा ध्यान । रद्धा सत के मैं धरव , गुरू मोर भगवान ।। गुरू मोर भगवान , गुरुवर के जस गाले । देय गुरू हे ज्ञान , जान के दरशन पाले ।। गुरू ज्ञान के खान , लगा ले माथ...

उठा लू कलम - दोहे ..........

*उठा कलम मोहन चला , लिखने जग की पीर* । *मानवता को जोड़ने , धरुँ नहीं अब धीर* ।1। *सदा कलम चलती रहे , करूँ नही आराम* । *करूँ जगत कल्याण मैं , करते परहित काम* ।2। *मानवता को जानले , जन वह बने महान* ...

मोर छत्तीसगढ़ महतारी

पावन भुईया महतारी के अउ सूत उठ करव परनाम जेखर मया के छइंहा मा जिहा बसे हावय मोर गाँव ।। डोगरी पहाड़ी रुख राई ले सजे हावय दरबार अउ आमा अमली बर पिपर के जिहा हावय सुघ्घर छाँव ।। ग...