बेटी के सुरक्छा (घनाक्षरी छंद)

बेटी ला जी मान मिले , चेहरा उखर खिले ।
आवव सबो मिलके , बेटी ला बचाव जी ।
बेटी बिन जग सुन्ना , गोठ सबो होंगे जुन्ना ।
बेटी ला बचाके अब , नवा जुग लाव जी ।
बेटी लछमी कहाँथे , तभे जी ओ मान पाथे ।
मान देके बेटी ला गा , मान खुद पाव जी ।
बेटी हा बने पढ़ही , रद्दा नवा ओ गढ़ही ।
बेटी ला बचाबो सब , किरिया ला खाव जी ।।

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         ||मयारू मोहन कुमार निषाद||
              गाँव लमती भाटापारा

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