किसान के पीरा (घनाक्षरी छंद )

बदली हा छावत हे , पानी नइ आवत हे ।
देखत किसान मन , बड़ पछताय जी ।
करत सबो बियासी , थोड़ा रोय थोड़ा हासी ।
जोहत हे रद्धा रोज , थक हार आय जी ।।
काही नइ भावत हे , सनसो हा खावत हे ।
करे का बिधाता जेन , फल ऐसे पाय जी ।
करत हे सबो सेवा , तभो नइ पाय मेवा ।
जुरमिल के गा रोज , गुन तोर गाय जी ।।

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      ||मयारू मोहन कुमार निषाद||
           गाँव लमती भाटापारा

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