बहू बेटी ला मानव कुंडलिया छंद

मानव  बेटी  ला  बने ,  देके  मया  दुलार ।
करव भेद झन आज तुम ,जिनगी के दिन चार ।।
जिनगी  के  दिन  चार , मान  बेटी  ला  देवव ।
मारव झन जी कोख , परन अब सब गा लेवव ।।
होथे  लक्ष्मी  रूप , मरम  ला  येखर जानव ।
बहु बेटी ला आज , रतन जी धन कस मानव ।।

      मयारू मोहन कुमार निषाद

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