सेवा करले कुंडलिया छंद

होवत हावय आज जी , देखव अत्याचार ।
नेता मनके राज मा , चलत हवय सरकार ।।
चलत हवय सरकार , सबो  मनमानी करथे ।
लूटत हावय रोज , जेब जी अपने भरथे ।।
देखत जनता आज , सबो जी दुख मा रोवत ।
नेता कइसन पाय , देख जी का हे होवत ।।

करले सेवा जी बने , जिनगी अपन  सँवार ।
बात कहत हव मानले , सेवा हावय सार ।।
सेवा हावय सार , भेद जी झन तय करबे ।
एक सबे ला मान , सबो के दुखला हरबे ।।
मिलही जी भगवान , सत्य के रस्ता धरले ।
होबे भवले पार , करम जी अइसन करले ।।

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