खेती कुंडलिया छंद

खेती समझव घर अपन, सब किस्मत के लेख ।
लहराही गा धान कस, बनके खातू देख ।।
बनके खातू देख, सुघर खेती हरियाही ।
दुख पीरा हा तोर, सबो तुरते मिट जाही ।।
बंजर भुइँया आज, बदल गे हमरो सेती ।
झन जा गाँव ल छोड़, नियत ले करले खेती ।।

खेती ला जी कर बने , सुग्घर होही धान |
खातू ला गा डारले , कहना मोरो मान |
कहना मोरो मान , धान ला सुग्घर पाबे |
नइ होवय नुकसान  , बाद मा नइ पछताबे |
बात हवय जी सार , कहत हँव येखर सेती |
आगे अब विज्ञान , करव जी सुग्घर खेती ||

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