अमृतध्वनि छंद
होवय झन अब हार जी , करत रहव प्रयास ।
मिलबे करही जीत हर , राख अटल विश्वास ।।
राख अटल विश्वास , धीर जी मनमा धरले ।
बनबे झन कमजोर , परन जी अइसन करले ।।
बैरी तोला , देख रोज जी , दुख मा रोवय ।
मान कभू झन हार , नाम जी जग मा होवय ।।
करले तँय हर दान जी , करनी बने सुधार ।
होवय जग मा नाम हा , जिनगी अपन सवाँर ।।
जिनगी अपन सवाँर जग म जी , जस बगराबे ।
मानवता ला , जान सुमत के , जोत जलाबे ।।
मानव हन सब , एक सत्य के , रस्ता धरले ।
होबे जी भव , पार करम ला , अइसन करले ।।
छोड़व दारू के नशा , नाश करै परिवार ।
कतको झन जी रोय हे , बात हवय ये सार ।
बात हवय ये , सार दारु ला , झन जी पीबे ।
बात कहत हँव , मान संग मा , जिनगी जीबे ।
रद्दा अइसन , धरके अब झन , घर ला तोड़व ।
लावव घर मा , सुख शान्ति गा , दारू छोड़व ।।
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