रुखराइ झन काटव चौपई छंद

रुखराइ ला झन तँय काट , इखरो दुख संगे मा बाँट ।
अपने जीव असन तँय जान , बेटा कस येमन ला मान ।।

हावय जिनगी के आधार , पेड़  छाँव देथे आपार ।
लकड़ी येखर आथे काम , जानव सब झन येखर दाम ।।

बनथे येखर जी सामान , नइ हावव कोनो अनजान ।
महता येखर जानव आज , जगमा होही तुंहर राज ।।

फुलथे फरथे जी भरपूर , करय बिमारी कतको दूर ।
आवय दवई बर ये काम , हावय जेखर कतको नाम ।।

रुखराइ ला तैहर लगा , भाग सबो के तँय गा जगा
हरियाली होही सब ओर ,  जगमा होहय तोरो शोर ।।

पेड़ काटना करदव बंद , कहिथे मोहन सुग्घर छंद ।
रुखराइ हावय अनमोल , कहय  तराजू  मा झन तोल ।।

मिलके पेड़ लगावव आज , बनही सबके बिगड़े काज ।
मनही खुशहाली सब ओर , महकय अँगना चारो खोर ।।

             ||मयारू मोहन कुमार निषाद||
                 गाँव लमती भाटापारा

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