बासी किसान रोटी दोहा छंद
गरमी मा बासी बने , मनला सबके भाय ।
खाले चटनी संग मा , खाये देह जुड़ाय ।।
करत किसानी के बुता , हावय आज किसान ।
खावत बासी पेज ला , उपजावत हे धान ।।
रोटी आटा के बने , होथे अबड़ मिठास ।
खुरमी चीला ठेठरी , हावय जी सब खास ।।
अइसा खुरमी ठेठरी , रोटी हे भरमार ।
दूध फरा अउ बोबरा , बनथे सबो तिहार ।।
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