बहुत हुआ अब राजनीति का , गंदा खेल को बन्द करो |
नमक यहा की खाकर , आज नमक हरामी ना करो ||
हाफिज और अफजल की भाँति , हाल तुम्हारा भी होगा |
मरोगे तुम कसाब की मौत , हजम नही पानी होगा ||
भूल गये तुम भारत की , मर्यादा और बड़प्पन को |
जिसने इतना है मान दिया , माँ की गौरव सनातन को ||
जाती धर्म का बोल आज , किसके दम पर है बोल गया
आस्तीन में बैठा साँप आज , सारे भेद है खोल गया ||
वन्दे मातरम्
||मयारू मोहन कुमार निषाद||
तोर सुरता मा नींद बैरी आवय नही । का करव मैं कुछू मोला भावय नही ।। तोर चेहरा मोर आंखी मा झुलत रहिथे । अन्न पानी मोला काही अब सुहावय नही ।। रात - दिन तोर सपना अब सताथे मोला । का ब...
कविता लिखे के पहली 1,का कवि *खुद ल सम्बोधित करत हे*, यदि हाँ, त- * मैं,मोर,मोला,मैहर(एकवचन म)अउ हमर,(बहुवचन म),हो सकत हे। *तीनो काल,*उत्तम पुरुष*(स्वयं उत्तम पुरुष बर होथे) म,मैं देखत हौं/म...
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