नही रही अब पहले जैसी , मौसम में ओ बात | तन्हा सा महसूस है होता , हुई बिरानी रात || पहले तो थी जीवन में , नगमे और बरसाते | उजड़ गये है आज सभी , कर के हमे बेगाने || ||मयारू मोहन कुमार निषाद||

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