नही रही अब पहले जैसी , मौसम में ओ बात |
तन्हा सा महसूस है होता , हुई बिरानी रात ||
पहले तो थी जीवन में , नगमे और बरसाते |
उजड़ गये है आज सभी , कर के हमे बेगाने ||
||मयारू मोहन कुमार निषाद||
तोर सुरता मा नींद बैरी आवय नही । का करव मैं कुछू मोला भावय नही ।। तोर चेहरा मोर आंखी मा झुलत रहिथे । अन्न पानी मोला काही अब सुहावय नही ।। रात - दिन तोर सपना अब सताथे मोला । का ब...
कविता लिखे के पहली 1,का कवि *खुद ल सम्बोधित करत हे*, यदि हाँ, त- * मैं,मोर,मोला,मैहर(एकवचन म)अउ हमर,(बहुवचन म),हो सकत हे। *तीनो काल,*उत्तम पुरुष*(स्वयं उत्तम पुरुष बर होथे) म,मैं देखत हौं/म...
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