दिया कखरो बुतागे , कुल के |
कखरो घर अंधियारी छागे ||
करम के नोहय लेख बिधाता |
ये कईसन बिपत्ति आगे ||
काखर पाप के दे सजा , दया थोरिक घलो नई लागे |
मासूम लईका मनला मारे , अब ये कईसन दिन आगे ||
दाई ददा जी कलपत हावय , कहा मोर बेटा गवांगे |
कईसन खेल खेले बिधाता , मोर कुल के दिया बुतागे ||
||मयारू मोहन कुमार निषाद||
तोर सुरता मा नींद बैरी आवय नही । का करव मैं कुछू मोला भावय नही ।। तोर चेहरा मोर आंखी मा झुलत रहिथे । अन्न पानी मोला काही अब सुहावय नही ।। रात - दिन तोर सपना अब सताथे मोला । का ब...
कविता लिखे के पहली 1,का कवि *खुद ल सम्बोधित करत हे*, यदि हाँ, त- * मैं,मोर,मोला,मैहर(एकवचन म)अउ हमर,(बहुवचन म),हो सकत हे। *तीनो काल,*उत्तम पुरुष*(स्वयं उत्तम पुरुष बर होथे) म,मैं देखत हौं/म...
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